मेरी व्यथा कथा


मेरी व्यथा कथा
मैं अपने आप से लगातार मिलने की कोशिश कर रहा हूं मगर मजाल है जो मुझ से मेरी मुलाकात हो जाए । लगता तो है मुझे खुद मेरी तलाश है मगर पता नहीं क्यों खुद से मुलाकात नहीं कर पाता । दिन भर पता नहीं चाहते हुए भी न कुछ लिख पाता हूं , ना कुछ पढ़ पाता हूं । बेवजह टीवी के सामने बैठकर हर 30 सेकंड में चैनल बदलता हूं । मन बहुत व्यथित है । पीड़ा बहुत गहन हैं । परंतु फिर भी दोनों समय पेट भर कर खाता हूं और दोपहर में एक-दो घंटे सो जाता हूं फिर शाम की चाय पीकर टीवी देखता हूं , और कोरोना से मरने वाले लोगों की संख्या में इजाफा होते सुनता हूं , देखता रहता हूं । देखता हूं वायरल वीडियो जिसमें डॉक्टरों पर , नर्सों पर पत्थर फेंकने वालों को दिखाया जाता है । देखता रहता हूं एक या दो दिन के अंतराल में कोरोना के कारण मृत्यु को गले लगाते हुए डॉक्टर्स , नर्सों को ।
कोरोना कभी किसी को नहीं छोड़ता , वह जात या पात नहीं देखता । पता नहीं क्यों हम इतने सांप्रदायिक हो गए हैं कि छोटी छोटी बातों को भी नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं ।
लाकडाउन के कारण लोग भूखे मर रहे हैं । दिहाड़ी मजदूर जिन्हें अनाज मिलना था , राशन मिलना था उन्हें राशन नहीं मिल रहा है उनके पास राशन कार्ड नहीं हैं । वे लोग परेशान हैं । सुदूर देहात में पता लगता है कि चार या पांच दिन से एख फेक्टरी के किसी चौकीदार का परिवार भूखा है । सुदूर गांव में पिछड़े लोगों की बस्ती में खाने को कुछ भी नहीं है । पता नहीं लोग कैसे अपने दिन काट रहे हैं । हालांकि सरकार और प्रशासन अपने अपने स्तर पर कार्य कर रहा है । कुछ लोगों के पास कुछ नहीं है और कुछ लोगों ने बार बार सहायता लेकर बहुत सारा राशन भर लिया है ।
यह मानव निर्मित महामारी कहां जाकर रुकेगी , पता नहीं ।
परंतु प्रशासकीय अधिकारी और स्वास्थ विभाग का अमला , डाक्टरस , नर्सेज , वार्ड बाय , कम्पाउंडर , पुलिसकर्मी , जो लोग इस महामारी से लड़ रहे हैं वे
वाकई धन्यवाद के पात्र हैं । वे सब अपने जीवन और जान की बाजी लगाकर लोगों को स्वस्थ करने में , लोगों की पीड़ा हरने में , लोगों का इलाज करने में , लगातार लगे हुए हैं . कई डॉक्टरस , पुलिसकर्मी तो पन्द्रह से बीस दिनों से घर तक नहीं गए हैं । कई कई डाक्टरस पुलिस अधिकारी , पुलिस के जवान घर जाते हैं तो बाहर आंगन में खाना खाकर वापस अपने काम पर लौट जातें हैं । इतना सब होने के बावजूद , और मुझे समझ में नहीं आता कि लोग क्यों इनका आभार मानने और कृतज्ञ होने के बजाय इनके साथ मारपीट जैसी कुत्सित , नीच हरकतें करते हैं , क्यों लोग दवाइयों को फेंक देते हैं , क्यों लोग इन्हें पत्थर मारते हैं , क्यों लोग ईन पर थूकते हैं क्यों इन्हें यह कहकर भगा देते हैं कि वे स्वस्थ हैं । और किसी आसमानी ताकत के द्वारा उन्हें इस लाइलाज बीमारी से मुक्ति मिल जाएगी ।

आजादी के 70 साल बाद भी , आज भी आम आदमी वहीं चौराहे पर खड़ा है । उसे इंतजार है कि कोई आएगा उसे दिनभर की मजदूरी के लिए ले जाएगा , कम से कम आज की मजदूरी मिलने से दो या तीन दिन उसके घर में चूल्हा जलेगा और उसका परिवार भरपेट या आधे पेट रोटी खाएगा । पता नहीं क्यों इतनी सारी सरकारी अनुदान की योजनाओं के बावजूद भी एक गरीब का पेट क्यों नहीं भरता ।
खास करके आज जो मध्यमवर्गीय परिवार की स्थिति है वह बहुत दयनीय है जो सबसे ज्यादा तकलीफ में है ।
सर्वहारा , बीपीएल कार्ड वालों के लिए तो फिर भी सरकार बहुत कुछ कर रही है परंतु जो मध्यमवर्गीय है वेअपना जीवन कितनी कठिनाई से बिता रहे हैं उसे शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल है । सरकार को मध्यमवर्गीय परिवारों की मदद के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाना चाहिये ।
इस विश्वव्यापी संकट की घड़ी में देश के सभी नागरिकों को एक जुट होकर कोरोना को हराना है । सरकारी नियमों का अक्षरशः पालन करना चाहिए । दिन में बार बार अच्छी तरह हाथ धोना चाहिए । सेनेटाइजर का इस्तेमाल करना चाहिए । घर में ही रहना चाहिए । जरुरी होने पर मास्क लगा कर ही निकलना चाहिए । लोटने पर हाथ पैर धोकर घर में प्रवेश करना चाहिए । सामाजिक दूरी बनाकर रखना चाहिए ।
चन्द्रशेखर बिरथरे
एक पथिक ।

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