प्रवासी मजदूर
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कितने दुख , कष्ट और मानसिक पीड़ा की बात है कि फिर एक साल बाद कोविड के प्रकोप के कारण लाकडाउन होने से प्रवासी मजदूर अपने घर लौटने लगे हैं थोड़ी सी राहत की बात यह है कि वे पैदल नहीं जा रहे हैं बल्कि उन्हें जो भी यात्रा का साधन मिल रहा है उससे वे घर लौट रहे हैं परंतु हो सकता है आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो जाए पिछली बार भी मैंने यह सुझाव दिया था कि प्रवासी मजदूरों को रहने के लिए स्थान मुहैया करवाया जाना चाहिए वे जिस भी फैक्ट्री में , कारखाने में या दुकानों में काम करते हैं उनके मालिकों की जिम्मेदारी है कि वे प्रवासी मजदूरों को रहने की जगह उपलब्ध करवाएं परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ और जब मजदूरों को लगा कि रहने की बात तो छोड़ो उनके खाने-पीने की भी कोई व्यवस्था नहीं हो रही है तो वे दुखी मन से अपने गांव या घर लौटना चाह रहे हैं । यह बहुत ही चिंता का विषय है। आज भी रोजनदारी पर काम करने वाले मजदूर लावारिस ही हैं हम भले ही प्रोविडेंट फंड या ईएसआईसी की योजना देश में चला रहे हैं लेकिन धरातल पर ऐसी व्यवस्थाएं क्यों नहीं है यहां तक की रोजनदारी पर मकान बनाने के काम करने करवाने वाला ठेकेदार भी मजदूरों का प्राविडेन्ट फंड काटता है और ई एस आई सी की किस्त भरता है फिर असंगठित रोजनदारी करने वालों के लिए कोई व्यवस्था क्यों नहीं है यह सही नहीं है । क्यों व्यापारी , फेक्ट्री मालिक , कारखाने चलाने वाले आज भी मजदूरों के कल्याण की चिन्ता
क्यों नहीं कर रहे हैं । क्या संबन्धित राज्य या केन्द्रीय शासकीय विभाग अपनी जिम्मदारी ठीक से नहीं निबाह रहे हैं । गहरी जांच का विषय है । इस विषय में कान्ट्रेक्ट लेबर के नियमों का पुनर्वालोकन करने की आवश्यकता है ।
चन्द्रशेखर बिरथरे पथिक
सनाढ्य
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