एकता

 पहले के हाथ में खंजर था ,
 दूसरे के हाथ में देसी तमंचा ,
 पहले के खंजर ने दूसरे की ,
 छाती के मान्स का स्वाद चखा ।
 दूसरे के देशी तमंचे की गोली ने पहले की ,
 छाती में छेद किया ,
 दोनों धराशाई होकर गिर पड़े ।
 बस्ती वीरान हो गई ।
 अब न वहां मस्जिद में नमाज होती है
 ना मंदिर में घंटियां बजती है ।

चन्द्रशेखर बिरथरे

Comments

  1. नीरज जैसे महान कवि ने ठीक ही कहा है
    ये तेरे न मेरे बस की है ,
    कौन जाने ये किसकी है ,
    राजनीति तो एक वेश्या है ,
    आज इसकी है तो कल उसकी है ।
    मगर पिछले दिनों महाराष्ट्र में घटे घटनाक्रम ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि राजनीति का स्तर वेश्या से भी कमतर हो गया है । विचारधारा और उसूलों की बात करने वाली पार्टियां सत्ता के लिए किस तरह नीचे गिरकर कीचड़ में सने , गंदी नालीयों के कीड़ों की तरह समझौते करती रहती है । ईश्वर हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों को सन्मति दे कि वे अपनी विचारधारा , उसूलों , नीतियों के लिए समर्पित रहें । पता नहीं आगे इस देश की जनता को क्या-क्या देखना पड़े वस्तुतः आज के माहौल में चुनाव जीतना एक शुद्ध विपणन कला रह गई है । क्यों ओऐ शंशनहीं जनता जनार्दन किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत देती है इसका कारण है क्षेत्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़े जाना और क्षेत्रीय पार्टियों का जीतना इस बात का द्योतक है कि हमारे देश में अभी भी मतदाता पूरी तरह जागरूक नहीं हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप देश के राज्यों में एक स्थाई सरकार नहीं बन पाती है । मैं समझता हूं कि देश की निरपेक्ष धर्मिता इस मामले में बहुत बड़ा योगदान करती है एक विशेष धर्म के अनुयाई एक विशेष धर्म , एक जाति विशेष के मानने वाले जाति और धर्म के नाम पर ही वोट करते हैं उन्हें विकास के नाम पर अपना वोट
    व्यर्थ करने में पता नहीं क्यों ठीक लगता है । ईश्वर अगर है तो मेरे देश के नागरिकों को संकीर्ण मानसिकता से बचाना । उनमें देश प्रेम की अलख जगाना ।

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