भटकते मजदूर

इंसानियत लहूलुहान है मानवता सिसक रही है हम अपनी व्यवस्थाओं को ठीक करने में जुटे हैं पता नहीं कब मजदूर नाम का प्राणी आम आदमी नाम का प्राणी इन सारी दिक्कतों से बच सकेगा उसे न तो उसके हिस्से की दवाई मिलती है ना उसके हिस्से का अनाज मिलता है और नहीं उसके हिस्से का सम्मान मिलता है जीवन उसके लिए एक अभिशाप है मार्क्स ने कहा था मजदूर का पसीना मजदूर का खून जो वह अपनी मेहनत से समाज को देता है उसे वापस पूंजी के रूप में मिलना चाहिए परंतु पूंजीपति अपने कारखाने औरफेक्टरीयों पर किए गए इन्वेस्टमेंट का न सिर्फ 100 गुना 200 गुना वसूल ता है और जीवन के सारे आनंदो को भोगता है और अभागा मजदूर अपने जीवन से जीवन की परेशानियों से मर कर ही  मुक्त होता है । बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ नहीं पाते बिटिया की शादी वह कर नहीं पाता मकान जो जो पढ़ा होता है उसे पक्का बना नहीं पाता और जिंदगी जीने के संघर्ष में जीवन से ही मुक्त हो जाता है वर्तमान में जो हजारों लाखों मजदूर अपने दड़बे में लौटना चाहते हैं उनके लिए राज्य सरकारों के पास कोई योजना नहीं है । राज्य सरकारें और केंद्र सरकार जो भी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है पता नहीं कितने हजारों मजदूर सड़क दुर्घटनाओं में , भूखे प्यासे सड़कों पर दम तोड़ देंगे हो सकता है वह अपने दड़बे पर पहुंच भी जाए पर और दड़बे के सामने ही उसकी मृत्यु हो जाए ।
उस अभागे मजदूर की बदकिस्मती पर रोइए जो थक के मर गया हो अपने घर के सामने

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