मेरी कविता

         हारना जीत की प्रत्याशा है ।
हर निराशा में एक आशा है ।
ख्वाहिशों के कई हिमालां हैं ,
आदमी क्या है एक कासा है ।
मेरा माजी ही मेरी दोलत है ,
वर्तमान आज भी धुआं सा है ।

चंद्रशेखर बिरथरे





मैं इक खाके जर्रा हूं चाहूं तो माहताब हो जाउँ ।
खुदी को करुं गर बुलंद तो आफताब हो जाऊँ ।

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