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Showing posts from May, 2020

लावारिस प्रवासी मजदूर

 कई मजदूर और उनके परिवार जो मुंबई में निवास करते थे और वहां अपने किए हुए काम से रोजी रोटी कमाते थे सुबह जब इंदौर में एक थोड़ी देर के लिए रुके जहां उन्हें चाय नाश्ता भोजन करवाया गया और आगे मार्ग के लिए भी चप्पले , दवाइयां दी गई । यह मालवा है और इन्दौर तो मानवता की सेवा हेतु सदैव अग्रणी रहा है और रहेगा । यह मध्य प्रदेश है जहां की जनता बहुत दयालु है , और कई एनजीओ यहां कार्यरत है । होना तो यह चाहिए था कि हर स्टेट महाराष्ट्र से आगे की सारी स्टेट्स हर 100 किलोमीटर पर एक भोजन सामग्री और अन्य सुविधाओं के लिए स्टाल लगा देतीं तो इन मजदूरों की मृत्यु का आकंड़ा कम होता । करीब 100 से ज्यादा प्रवासी मजदूर घर लौटने के प्रयासों में असमय काल का ग्रास बन चुके हैं । सड़क दुर्घटना में मरे हुए मजदूरों का आंकड़ा अलग है । खैर जो हुआ सो हुआ पर आश्चर्य की बात यह है कि इन मजदूरों ने बताया कि उनके साथ मुंबई में और महाराष्ट्र के रास्तों पर बहुत ही अपमानजनक और रुखा व्यवहार किया गया । किसी भी गांव में , किसी भी शहर में उनके प्रवास में होने वाली असुविधाओं , परेशानियों को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया , बल्क...

भटकते मजदूर

इंसानियत लहूलुहान है मानवता सिसक रही है हम अपनी व्यवस्थाओं को ठीक करने में जुटे हैं पता नहीं कब मजदूर नाम का प्राणी आम आदमी नाम का प्राणी इन सारी दिक्कतों से बच सकेगा उसे न तो उसके हिस्से की दवाई मिलती है ना उसके हिस्से का अनाज मिलता है और नहीं उसके हिस्से का सम्मान मिलता है जीवन उसके लिए एक अभिशाप है मार्क्स ने कहा था मजदूर का पसीना मजदूर का खून जो वह अपनी मेहनत से समाज को देता है उसे वापस पूंजी के रूप में मिलना चाहिए परंतु पूंजीपति अपने कारखाने औरफेक्टरीयों पर किए गए इन्वेस्टमेंट का न सिर्फ 100 गुना 200 गुना वसूल ता है और जीवन के सारे आनंदो को भोगता है और अभागा मजदूर अपने जीवन से जीवन की परेशानियों से मर कर ही  मुक्त होता है । बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ नहीं पाते बिटिया की शादी वह कर नहीं पाता मकान जो जो पढ़ा होता है उसे पक्का बना नहीं पाता और जिंदगी जीने के संघर्ष में जीवन से ही मुक्त हो जाता है वर्तमान में जो हजारों लाखों मजदूर अपने दड़बे में लौटना चाहते हैं उनके लिए राज्य सरकारों के पास कोई योजना नहीं है । राज्य सरकारें और केंद्र सरकार जो भी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं वह ऊंट के...

प्रवासी मजदूरों का दर्द

हजारों हजार मजदूर और उनके परिवार अपने पैतृक घरों की ओर लौट रहे हैं । उनकी यातनाओं ओंर उनकी विषमताओं और उनके दर्द को कौन महसूस कर रहा है । राज्य सरकारें अपना दामन बचा रही है , केंद्र सरकार है उनके हिस्से का अनाज और अन्य वस्तुएं राज्य सरकारों को दे रही हैं पर फिर क्यों इन मजदूरों को उनका हक मिल नहीं पा रहा है । अगर उन्हें समुचित अनाज भोजन आदि मिले तो वे क्यों कर अपना ठिया छोड़ेंगे , क्यों कर अपनी रोजी-रोटी छोड़ कर वापस अपने मुल्क जाना पसंद करेंगे  । झोल कहां हैं देखना चाहिए घोषणाएं बहुत हो रही है पर क्या उसका लाभ अंतिम व्यक्ति को मिल रहा है । जो भी  उपक्रम राज्य सरकार या केंद्र सरकार कर रही है वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है हजारों हजार बसों का इंतजाम कर देने के बाद भी बहुत सारी ट्रेनें चला देने के बाद भी ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इन मजदूरों को अपने गांव जाने का मौका मिल पाएगा बताया जा रहा है कि करीब 100 से ज्यादा मजदूर अपने घर लौटने के प्रयास में मृत्यु को गले लगा चुके हैं । सड़क दुर्घटनाएं रोज ही हो रही हैं दसियों मजदूर सड़क दुर्घटना में काल कवलित  हो रहे हैं । पता नहीं...